COURSE

साधक अपना ध्यान किसी भी समय गुरु या भगवान या अपने इष्ट की और से न हटाये। चलते, फिरते, सोते, जागते, खाते, पीते, सभी समय चित्त वृति का झुकाव अपने इष्ट, भगवान या गुरू पर ही रहना चाहिए जिससे उस ओर से आने वाली वाहनी प्राण धारा साधक के हृदय में प्रवेश कर सके। यह प्राण धारा मन, बुद्धि और चित्त आवरणो को हटाकर उनको शुद्ध और साधना के योग्य बना देगी। वह साधक को ऊँचा उठाती रहेगी। विचारों का नाश करके अज्ञान का भी नाश करेगी। —— गुरु माॅ तपेश्वरी जी।

साधक यह कभी न सोचे कि हम ऊँचे चढ़ आये या नीचे गिर गये है। हमारी योग स्थिति अच्छी है या बुरी। इस प्रकार की कल्पना या अनुमान गलत है। साधना मे साधक दृष्टा है वह केवल देखता चले, जब तक माया है तब तक द्वन्द है और पतन है।अतः वह बुरे से धृणा न करे और अच्छे से प़सन्न न होये। उसे आगे बढ़कर भगवतृ साक्षात्कार करना है। जब अन्तर्यामी भगवान उनके साथ है और वे साधक को साधना मार्ग पर चला रहे है, तब साधक नीचे कभी नही गिर सकता। –

गुरु माॅ तपेश्वरी जी।